दैनिक जीवन में किसी भी धात्विक साधन के यकायक टूट जाने व नव उत्पाद निर्माण में भिन्न-भिन्न वेल्डिंग विधियों का आवश्यकता के अनुसार प्रयोग किया जाता है-
आर्क वेल्डिंग
आग बिजली के इलेक्ट्रोड के मध्य भवा में उत्पन्न किया गया इलेक्ट्रॉनों का विसर्जन है इसका स्वरूप और गुण फ्लेम के समान होता है ,विद्युत अर्क अधिक धारा और कम वोल्टेज पर उत्पन्न होता है।
सिद्धांत -- इलेक्ट्रोड और कार्य खंड के मध्य 13mm से 10mm तक के रिक्त स्थानों में आग उत्पन्न की जाती है प्रारंभ में उच्च विभव के कारण कैथोड से निकले इलेक्ट्रॉन रिक्त स्थान में हवा को आयनी कर देते हैं यह आयनीकृत हवा विद्युत की सुचालक बन जाती है इस प्रकार विद्युत इसके अंदर से होकर बहने लगती है इसी उष्मा से इलेक्ट्रोड का सिरा गर्म होकर पिघलने की स्थिति में आ जाता है, और इलेक्ट्रॉन के साथ ही कार्य करने की ओर बहने लगता है इस प्रकार आर्क विद्युत ऊर्जा को ताप ऊर्जा में बदलने का एक साधन है,आर्क का तापमान 3500 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है जिसके कारण इलेक्ट्रोड की धातु शीघ्रता से पिघल जाती है और साथ ही कार्यखंड की वेल्ड होने वाली सतह भी पिघल जाती है कुछ पिघली धातुएं आपस में मिलकर वेल्ड पुल बनाती हैं इलेक्ट्रोड द्वारा प्राप्त पिछली धातु फिलर धातु और कार्य खंड की पिछली धातु बेस धातु कहलाती है यह दोनों धातुओं आपस में मिलकर और ठंडी होकर वेल्डिंग जोड़ बनाती है।
कार्य विधि- कैथोड इलेक्ट्रोड का प्रयोग करते हुए हाथ द्वारा की जाने वाली वेल्डिंग का मैनुअल मैटेलिक आर्क वेल्डिंग कहते है यह आर्क इलेक्ट्रोड तथा जॉब को इलेक्ट्रिक धारा देकर प्राप्त की जाती है इस आर्क में जॉब की धातु पिघल कर एक कुंड बनाती है उसी कुंड में इलेक्ट्रोड की धातु भी पिघलकर मिल जाती है इस प्रकार पिछली अवस्था में बेस धातु तथा अधातु आपस में मिलकर वेल्ड धातु बनाती है यह बेल्ट धातु जमने पर पक्का तथा स्थाई जोड़ बनाती है। मैनुअल मैटेलिक आर्क वेल्डिंग की में आवश्यकता धारा को ए०.सी० या डी०सी० वेल्डिंग मशीन के द्वारा प्राप्त किया जाता है जब इलेक्ट्रोड को जॉब के अति निकट लाया जाता है तो उनके मध्य उपस्थित हवा व कॉलम आयनिक हो जाते हैं इसके कारण इलेक्ट्रॉन इस कॉलम के पास होने लगता है तथा आर्क का स्वरूप ले लेता है इस आर्क के प्रतिरोध के कारण ऊष्मा उत्पन्न होती है इस उष्मा का ज्यादातर ताप जॉब को पिघलाता है तथा शेष इलेक्ट्रोड को पिघलने का काम करता है ,इस आर्क का तापमान 3600 डिग्री सेल्सियस से 4000 डिग्री सेल्सियस तक हो सकता है इलेक्ट्रोड से ऊपर एक विशेष प्रकार का फ्लक्स चढ़ा होता है जो धातु के साथ पिघल कर वेल्ड पुल के ऊपर तैरता रहता है तथा वेल्ड धातु को वायुमंडलीय गैसों के प्रभाव से सुरक्षा प्रदान करता है जब वेल्ड धातु ठंडी होती है ,तो यह फ्लक्स भी एक पपड़ी के समान वेल्ड बीड धीरे धीरे ठंडी होती है ,इस कारण बीड में ऊष्मीय प्रतिबल कम पैदा होते हैं।फ्लक्स के पिघलने पर गैसो का निर्माण होता है जो पिघली धातु को सुरक्षित रखती है इस कारण इसे शीलड्ड डार्क वेल्डिंग भी कहा जाता है। वेल्डिंग की चाल तथा फीड का नियंत्रण हाथ द्वारा किया जाता है इसलिए इसे मैन्युअल मैटालिक आर्क वेल्डिंग कहा जाता है।इसके नियम लाभ है जिसके कारण यह विधि अधिक प्रचलित है।
प्रकार - वेल्डिंग के अंतर्गत निम्न प्रकार की वेल्डिंग सम्मिलित है-
1. कार्बन आर्क वेल्डिंग
2. प्लाजमा आर्क वेल्डिंग
3. शेल्डेड मेटल आर्ट वेल्डिंग
4. मैनुअल मैटेलिक आर्क वेल्डिंग
5. टंगस्टन इनर्ट गैस वेल्डिंग
6.मेटल इनर्ट गैस वेल्डिंग

